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दिल्ली हाईकोर्ट में उठा सवाल: क्या रेस्टोरेंट्स MRP से ज्यादा वसूल सकते हैं?


दिल्ली हाईकोर्ट में शुक्रवार को एक अहम सुनवाई हुई, जिसमें होटलों और रेस्टोरेंट्स द्वारा लिए जाने वाले **सर्विस चार्ज** और MRP से ज्यादा कीमत वसूली का मुद्दा चर्चा का केंद्र बना।


पृष्ठभूमि: सर्विस चार्ज पर विवाद


पिछले साल *केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA)* ने दिशा-निर्देश जारी किए थे कि रेस्टोरेंट्स और होटल अपने बिलों में स्वतः सर्विस चार्ज नहीं जोड़ सकते। ग्राहक चाहे तो टिप या योगदान दे सकता है, लेकिन यह पूरी तरह स्वेच्छा पर निर्भर करेगा।


मार्च 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने भी इन गाइडलाइंस को सही ठहराया और कहा कि अनिवार्य सर्विस चार्ज ग्राहकों पर “जबर्दस्ती का बोझ” है।


इसी आदेश के खिलाफ नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) और फेडरेशन ऑफ होटल्स एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशंस ऑफ इंडिया (FHRAI) ने अपील की है।


कोर्ट में क्या हुआ?


केंद्र सरकार की आपत्ति: एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि कई रेस्टोरेंट अब भी सर्विस चार्ज वसूल रहे हैं, जैसे कि यह उनका “विशेष अधिकार” हो।


रेस्टोरेंट्स का पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता संदीप सेठी ने तर्क दिया कि सर्विस चार्ज कीमत नियंत्रण का विषय नहीं है, बल्कि यह कॉन्ट्रैक्ट का मामला है। उन्होंने कहा: रेस्टोरेंट का मेन्यू एक इनविटेशन टू ऑफर है। ग्राहक चाहे तो यहाँ भोजन और सेवा ले, चाहे तो कहीं और चला जाए। इसमें कोई बाध्यता नहीं है। डिलीवरी ऑर्डर पर सर्विस चार्ज लागू नहीं होता, यह केवल रेस्टोरेंट में बैठकर मिलने वाली सेवाओं के लिए है।


जजों के सवाल:

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए:


* ₹20 MRP वाली पानी की बोतल ₹100 में कैसे बेची जा सकती है?

* जब सर्विस चार्ज पहले से अलग से जोड़ा जा रहा है, तो “एम्बियंस” और “अनुभव” के नाम पर अतिरिक्त वसूली क्यों नहीं उसी का हिस्सा मानी जाए?

* अगर ग्राहक माहौल, बैठने की सुविधा, संगीत और सेवा का आनंद ले रहा है, तो क्या यह सब पहले से सर्विस चार्ज में शामिल नहीं होना चाहिए?


जजों ने साफ कहा कि यदि रेस्टोरेंट अतिरिक्त राशि ले रहे हैं तो उसे स्पष्ट रूप से बताना होगा, वरना यह एमआरपी नियमों का उल्लंघन है।


आगे क्या? मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी। अदालत ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे पर अंतिम फैसला सुनाएगी और अंतरिम राहत पर विचार नहीं किया जाएगा।


निष्कर्ष


यह बहस केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं की जेब और अधिकारों से जुड़ा मामला है। एक तरफ रेस्टोरेंट्स का दावा है कि वे अपने अनुभव और सेवाओं की कीमत तय करने के लिए स्वतंत्र हैं, तो वहीं कोर्ट और उपभोक्ता समूह मानते हैं कि ग्राहकों पर बिना पूछे अतिरिक्त भार डालना सही नहीं।


आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि हाईकोर्ट का फैसला उपभोक्ता अधिकारों और रेस्टोरेंट उद्योग के बीच संतुलन कैसे स्थापित करता है।


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